Saturday, 21 February 2015

ठाकुर अमर सिंह के साथ क्षत्रियोँ के विकास पर विचार विमर्श करते हुए ठाकुर संतोष सिंह





             
               ठाकुर अमर सिंह  के साथ क्षत्रियोँ के विकास पर विचार विमर्श करते हुए ठाकुर संतोष सिंह 

ठाकुर अमर सिंह के साथ विदर्भ महाराष्ट्र दौरे पर ठाकुर संतोष सिंह


                               ठाकुर अमर सिंह  के साथ विदर्भ महाराष्ट्र  दौरे पर ठाकुर संतोष सिंह 

अखिल क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुंवर हरिवंश सिंह के साथ वार्ता करते हुए ठाकुर संतोष सिंह





अखिल क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुंवर हरिवंश सिंह  के साथ वार्ता करते हुए  ठाकुर संतोष सिंह 

क्षत्रिय राजपूत इतिहास.....आन-बान-शान :-धर्म की रक्षा




                 (आन-बान-शान :- धर्म की रक्षा)

हमारे देश का इतिहास आदिकाल से गौरवमय रहा है,क्षत्रिओं की आन बान शान की रक्षा केवल वीर पुरुषों ने ही नही की बल्कि हमारे देश की वीरांगनायें भी किसी से पीछे नही रहीं। आज से लगभग एक हजार साल पुरानी बात है,गुजरात में जयसिंह सिद्धराज नामक राजा राज्य करता था,जो सोलंकी राजा था,उसकी राजधानी पाटन थी,सोलंकी राजाओं ने लगभग तीन सौ साल गुजरात में शासन किया,सोलंकियों का यह युग गुजरात राज्य का स्वर्णयुग कहलाया। दुख की यह बात है,कि सिद्धराज अपुत्र था,वह अपने चचेरे भाई के नाती को बहुत प्यार करता था। लेकिन एक जैन मुनि हेमचन्द ने यह भविष्यवाणी की थी,कि राजा सिद्धराज जयसिंह के बाद यह नाती कुमारपाल इस राज्य का शासक बनेगा। जब यहबात राजा सिद्धराज जयसिंह को पता लगी तो वह कुमारपाल से घृणा करने लगा। और उसे मरवाने की विभिन्न युक्तियां प्रयोग मे लाने लगा। परन्तु क्मारपाल सोलंकी बनावटी भेष में अपनी जीवन रक्षा के लिये घूमता रहा। और अन्त में जैन मुनि की बात सत्य हुयी। कुमारपाल सोलंकी पचपन वर्ष की अवस्था में पाटन की गद्दी पर आसीन हुआ।राजा कुमारपाल बहुत शक्तिशाली निकला,उसने अच्छे अच्छे राजाओं को धूल चटा दी,अपने बहनोई अणोंराज चौहान की भी जीभ काटने का आदेश दे दिया। लेकिन उसके गुरु ने उसकी रक्षा की। कुमारपालक जैन धर्म का पालक था,और अपने द्वारा मुनियों की रक्षा करता था। वह सोमनाथ का पुजारी भी था। राज्य के गुरु हेमचन्द थे,और महामन्त्री उदय मेहता थे,यह मानने वाली बात है कि जिस राज्य के गुरु जैन और मन्त्री जैन हों,वहां का जैन समुदाय सबसे अधिक फ़ायदा लेने वाला ही होगा।राजाकुमारपाल तेजस्वी ढीठ व दूरदर्शी राजा था,उसने अपने प्राप्त राज्य को क्षीण नही होने दिया,राजा ने मेवाड चित्तौण को भी लूटा था,६५ साल की उम्र मे राजा कुमारपाल ने चित्तौड के राजा सिसौदिया से शादी के लिये लडकी मांगी थी,और सिसौदिया राजा ने अपनी कमजोरी के कारण लडकी देना मान भी लिया था। राजा ने यह भी शर्त मनवा ली थी कि वह खुद शादी करने नही जायेगा,बल्कि उसकी फ़ेंटा और कटारी ही शादी करने जायेगी। मेवाड के राजाओं ने भी यह बात मानली थी।एक भांड फ़ेंटा और कटारी लेकर चित्तौण पहुंचा, राजकुमार सिसौदिनी से शादी होनी थी। राजकुमारी ने भी अपनी शर्त शादी के समय की कि वह शादी तो करेगी,लेकिन राजमहल में जाने से पहले जैन मुनि की चरण वंदना नही करेगी। उसने कहा कि वह एकलिंग जी को अपना इष्ट मानती है। उसके मां बाप ने यह हठ करने से मना किया लेकिन वह राजकुमारी नही मानी।रानी ने कुमारपाल की कटारी और फ़ेंटा के साथ शादी की और उस भाट के साथ पाटन के लिये चल दी। मन्जिलें तय होती गयीं और रानी सिसौदिनी की सुहाग की पूरक फ़ेंटा कटारी भी साथ साथ चलती गयी। सुबह से शाम हुयी और शाम से सुबह हुयी इसी तरह से तीन सौ मील का सफ़र तय हुआ और रानी पाटन के किले के सामने पहुंच गयी। राजा कुमारपाल के पास सन्देशा गया कि उसकी शादी हो कर आयी है और रानी राजमहल के दरवाजे पर है,उसका इन्तजार कर रही है। राजा कुमारपाल ने आदेश दिया कि रानी को पहले जैन मुनि की चरण वंदना को ले जाया जाये,यह सन्देशा रानी सिसौदिनी के पास भी पहुंचा,रानी ने भाट को जो रानी की शादी के लिये फ़ेंटा कटारी लेकर गया था,से सन्देशा राजा कुमारपाल को पहुंचाया कि वह एक लिंग जी की सेवा करती है और उन्ही को अपना इष्ट मानती है एक इष्ट के मानते हुये वह किसी प्रकार से भी अन्य धर्म के इष्ट को नही मान सकती है। यही शर्त उसने सबसे पहले भाट से भी रखी थी। राजा कुमारपाल ने भाट को यह कहते हुये नकार दिया कि राजा के आदेश के आगे भाट की क्या बिसात है,रानी को जैन मुनि को के पास चरण वंदना के लिये जाना ही पडेगा। रानी के पास आदेश आया और वह अपने वचन के अनुसार कहने लगी कि उसे फ़ांसी दे दी जावे,उसका सिर काट लिया जाये उसे जहर दे दिया जाये,लेकिन वह जैन मुनि के पास चरणवंदना के लिये नही जायेगी। भाट ने भी रानी का साथ दिया और रानी का वचन राजा कुमारपाल के छोटे भाई अजयपाल को बताया,राजा अजयपाल ने रानी की सहायता के लिये एक सौ सैनिकों की टुकडी लेकर और अपने बेटे को रानी को चित्तौड तक पहुंचाने के लिये भेजा। राजा कुमारपाल को पता लगा तो उसने अपनी फ़ौज को रानी को वापस करने के लिये और गद्दारों को मारने के लिये भेजा,राजा अजयपाल की टुकडी को और उसके बेटे सहित रानी को कुमारपाल की फ़ौज ने थोडी ही दूर पर घेर लिया,रानी ने देखा कि अजयपाल की वह छोटी सी टुकडी और उसका पुत्र राजा कुमारपाल की सेना से मारा जायेगा,वह जाकर दोनो सेनाओं के बीच में खडी हो गयी और कहा कि उसके इष्ट के आगे कोई खून खराबा नही करे,वह एकलिंग जी को मानती है और उसे कोई उनकी आराधना करने से मना नही कर सकता है,अगर दोनो सेनायें उसके इष्ट के लिये खून खराबा करेंगी तो वह अपनी जान दे देगी,राजा कुमारपाल और राजा अजयपाल कापुत्र यह सब देख रहा था,रानी सिसौदिनी ने अपनी तलवार को अपनी म्यान से निकाला और चूमा तथा अपने कंठ पर घुमा ली,रानी का सिर विहीन धड जमीन पर गिरपडा। कुमारपाल और अजयपाल की सेना देखती रह गयी,रानी का शव पाटन लाया गया। रानी के शव को चन्दन की चिता पर लिटाया गया,और उसी भाट ने जो रानी को फ़ेंटा कटारी लेकर शादी करने गया था ने रानी की चिता को अग्नि दी। अग्नि देकर वह भाट जय एक लिंग कहते हुये उसी चिता में कूद गया,उसके कूदने के साथ दो सौ भाट जय एकलिंग कहते हुये चिता में कूद गये,और अपनी अपनी आहुति आन बान और शान के लिये दे दी। आज भी गुजरात में राजा कुमारपाल सोलंकी का नाम घृणा और नफ़रत से लिया जाता है तथा रानी सिसौदिनी का किस्सा बडी ही आन बान शान से लिया जाता है। हर साल रानी सिसौदिनी के नाम से मेला भरता है,और अपनी पारिवारिक मर्यादा की रक्षा के लिये आज भी वहां पर भाट और राजपूतों का समागम होता है। यह आन बान शान की कहानी भी अपने मे एक है लेकिन समय के झकोरों ने इसे पता नही कहां विलुप्त कर दिया है.

राजपूतों की सूची







राजपूतों की सूची

राजपूत भारतीय उपमहाद्वीप (भारत, पाकिस्तान, बाँग्लादेश और नेपाल) की बहुत ही प्रभावशाली जाति है, जो शासन और सत्ता के सदैव निकट रही है। अपनी युद्ध-कुशलता और शासन-क्षमता के कारण राजपूतों ने पर्याप्त ख्याति अर्जित की. १५ अगस्त १९४७ को स्वतन्त्र हुए भारत की ६०० रियासतों में से लगभग ४०० पर राजपूत राजाओं का शासन था। भारत और पाकिस्तान, जिसे १५ अगस्त १९४७ के पूर्व हिन्दुस्तान के नाम से ही जाना जाता था, की कुल ४०० रियासतों के राजपूत राजाओं/राजपुत्रों की एक आंशिक सूची नीचे दी जा रही है, ताकि इतिहास के विद्यार्थी इस पर आगे काम कर सकें।

ऐतिहासिक

KANSINGH KHUNDAWAS AKHIL BHARTIY YHOVA RAJPUT PARISAD NATIONAL PRASIDENT -National President of Youth RAJPUT PARISAD SINCE 2012 TO TILL TIME

आधुनिक युग

National politics

  • Vishwanath Pratap Singh-The 10th Prime Minister of India. Former Finance Minister of India, also Served as Chief Minister Of Uttar Pradesh.
  • Chandra Shekhar - The 11th Prime Minister of India. Led Samajwadi Janata Party (Rashtriya)
  • Maharaj Bhanu Prakash Singh Ji - Former Member of Parliament from Rajagrh and Former Governor of Goa
  • Bhairon Singh Shekhawat - Former Vice President of India. Also served Three times Chief Minister Of Rajasthan from BJP party.
  • Bhakt Darshan(Singh Rawat)Former Union Minister Govt. of India. He is one of the few Indian politicians to have been the Minister for Defence, Finance and External Affairs.
  • Jaswant Singh - Leader of opposition, Rajya Sabha& Former Finance Minister of India
  • Arjun Singh - Senior Congress Leader. Minister for Human Resource and Development . Served 2 Times as chief Minister of Madhya Pradesh.
  • Anugrah Narayan Sinha - Eminent Freedom Fighter
  • Karan Singh - Congress Leader & First Governor of Jammu & kashmir
  • Maharani Gayatri Devi Won the constituency in the Lok Sabha in 1962, 1967,1971.
  • Rajnath Singh - President of BJP. Also served as Chief minister of Uttar Pradesh.
  • Thakur Rajveer Singh-former member of parliament(Aonla, U.P.)
  • Digvijay Singh Former Chief Minister under Madhya Pradesh. He is the general secretary of the Samajwadi Party and a member of the Rajya Sabha.
  • Abhay singh)(-chief enineer)

State politics

haryana, president- INDIAN COMPUTER EDUCATION SOCIETY

भारतीय सशस्त्र सेनाएँ

Defence

Thakur Bhim Singh Sodha 1965 special officer of Indian army

खेल

Art, Culture, Cinema, Law & Fashion

bijender singh shekhawat

Friday, 24 June 2011

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा

संतोष सिंह -महामंत्री एवं प्रभारी महारास्ट्रप्रदेश 
अखिल भारतीय  क्षत्रिय महासभा  

Sunday, 8 May 2011

MaharanaPratap (May 9, 1540 – January 29, 1597)




Maharana Pratap Jayanti is the birthday celebrations of a famous ruler of Mewar. It is one of the popular festivals that Rajputs of Rajasthan observe. MaharanaPratap Jayanthi is mainly celebrated in Rajsamand district of Rajasthan every year on Shukla Thritiya of the Ashad month (May or June). In year 2010, Maharana Pratap Jayanti is date on 15th June. MaharanaPratap (May 9, 1540 – January 29, 1597) was a Hindu ruler of Mewar, a state in north-western India.
He belonged to the Sisodia clan of Suryavanshi Rajputs. The epitome of fiery Rajput pride and self-respect, Pratap has for centuries exemplified the qualities to which Rajputs aspire. MaharanaPratapJayanti is celebrated with cultural programs. Children are dressed in the style of this King. Local people climb the hill and pay homage to this king and his divine horse Chetak. In Udaipur Memorial light and sound program display the glorious 1400 years of Mewar’s history.